Wednesday, October 10, 2018

ऑनलाइन स्ट्रीमिंग का वो जिन्न जो आंखों के रास्ते आपको जकड़ लेगा

'तू पाब्लो एस्कोबार को जानता है? क्या यार! नेटफ्लिक्स पर 'नारकोस' देख न. एक बार देखने बैठेगा न तो पूरा देखकर ही उठेगा.'
ऐसी बातें शायद आपने कहीं न कहीं सुनी होंगी. 'पूरा देखकर ही उठेंगे' लत अब तेजी से उन लोगों में फ़ैल रही है जो धीरे-धीरे वर्चुअल दुनिया के क़रीब और इंसानों और मनोरंजन के पुराने तरीकों से दूर होते जा रहे हैं.
वर्चुअल यानी आभासी दुनिया जो आपको एक ऐसी जगह ले जाती है जिसका हक़ीक़त से नाता नहीं होता. मगर आपको वहां असल दुनिया से ज़्यादा सुख मिलता है. मोबाइल, लैपटॉप से लेकर टीवी की स्क्रीन को देखते रहने की लत भी इसी पेड़ की ऐसी शाखा है जिसमें आज की पीढ़ी झूला डालकर झूल रही है और खुश हो रही है.
बंगलुरु में 23 साल का एक लड़का ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट की लत का ऐसा शिकार हुआ कि अब उसका वक़्त नेटफ्लिक्स, अमेजॉन, यू-ट्यूब सिरीज़ या वीडियो गेम में नहीं इलाज करवाने में बीत रहा है.
इस लड़के का इलाज नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस ( ) में बीते दो हफ़्तों से चल रहा है. ये लड़का दिन-रात नेटफ्लिक्स में कुछ न कुछ देखता रहता था. वजह- असल ज़िंदगी की परेशानियों से दूर रहना और वर्चुअल सुख को सच मानना.
मगर कोई ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट कब लत बनकर आपको असल ज़िंदगी और अपनों से दूर कर देती है? बंगलुरु के इस मामले के ज़रिए हमने यही समझने की कोशिश की.में इस लड़के का इलाज करने वाले डॉक्टर मनोज कुमार शर्मा ने बीबीसी हिंदी से इस बारे में ख़ास बातचीत की. हालांकि इस लड़के से हमारा संपर्क नहीं हो पाया.
डॉक्टर मनोज बताते हैं, ''इस लड़के का गेमिंग पर तो कंट्रोल है, लेकिन ऑनलाइन शो देखते हुए काफ़ी वक़्त बीत जाता है. वक़्त की उपलब्धता और शो की वजह से तनावमुक्त रहने की सुविधा के चलते वो कोशिश करता कि सारा वक़्त यहीं बिता दे. मना करने पर चिड़चिड़ापना दिखाता है और अपने आप में रहते हुए इसने परिवार से बात करना कम कर दिया था.''
ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स की एक बड़ी लत असल ज़िंदगी की परेशानियों से ध्यान हटाना भी होती है. असल ज़िंदगी की परेशानियां जैसे....
  • अच्छी नौकरी
  • पढ़ाई में अच्छा न कर पाना
  • किसी और वजह से मानसिक तनाव
ऐसे में इन परेशानियों से ध्यान हटाने के लिए भी लोग अब ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स की तरफ बढ़ रहे हैं.
जयपुर के अक्षय भी ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स पर अच्छा ख़ासा वक़्त गुज़ारते हैं.
इन वेबसाइट्स में रुचि को लेकर अक्षय कहते हैं, ''इसमें वक़्त की कोई पाबंदी नहीं होती है. जब चाहे, तब देखो. इनका फ़ायदा ये है कि अगर आपका राजा बाबू देखने का मन करे और उस वक़्त बैंडिट क्वीन देखने को मिले तो नहीं देखूंगा. मूड के हिसाब से कंटेंट भी बदलता रहता है. भीड़ में भीड़ से दूर रहना हो तो ये एक साथी जैसा काम करता है.'डॉक्टर मनोज कहते हैं, ''अगर कोई स्क्रीन के सामने लंबा वक़्त बिता रहा है तो ये एक बड़ा लक्षण है. हमारे यहां जो केस आए हैं, वो 6-7 घंटे
नेटफ्लिक्स के आंकड़ों के मुताबिक़, 2017 में इस वेबसाइट पर एक दिन में लोगों ने कुल 140 मिलियन घंटे बिताए. नेटफ्लिक्स का एक सब्सक्राइबर औसतन इस साइट पर रोज़ 50 मिनट गुज़ारता है.
नेटफ्लिक्स ने 2017 में साल के आख़िर में 117 मिलियन सब्सक्राइबर का लक्ष्य रखा था.
स्टेटिस्टा के मुताबिक़, अमेजॉन प्राइम वीडियो के 2017 में 40 मिलियन सब्सक्राइबर थे. अनुमान है कि 2020 में तादाद 60 मिलियन यूज़र से ज़्यादा होगी.
सीएनबीसी की एक ख़बर के मुताबिक, अमेजॉन प्राइम वीडियो में औसतन हर हफ्ते एक यूजर 5 घंटे गुज़ारता है जबकि नेटफ्लिक्स पर 10 घंटे.
स्क्रीन के सामने बैठने के हैं. लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो 14-15 घंटे ऑनलाइन वेबसाइट्स को लगातार देखते हैं.''
 का मानना है कि एक पहलू ये भी है कि लोग ऑनलाइन स्ट्रीमिंग को सच और असल दुनिया को झूठा मानने लगते हैं. इससे एजुकेशन और शिक्षा पर भी असर होता है.
इस सवाल के जवाब में डॉक्टर मनोज ने कहा, ''हमें सबसे पहले ये मानना होगा कि कुछ लोग मानसिक, व्यावहारिक कारणों से ऐसा करते हैं तो उनमें ज़्यादा देख लिया जाता है. लेकिन कुछ लोग खाली वक़्त में ये शो देखने लगते हैं. सबसे पहले ऐसी किसी भी आदत की पहचान करना ज़रूरी है. जैसे पांच-छह मिनट में स्क्रीन की तरफ़ जाए बिना खुद को रोक न सकें.''
  • अपने आप को रोकने की कोशिश करें
  • अगर इन कोशिशों के बाद भी असर न हो तो डॉक्टर के पास जाएं
 में डॉक्टर मनोज शर्मा ने कहा, ''डॉक्टर के पास जाने का ये फ़ायदा होगा कि वो आपकी लाइफस्टाइल पर भी काम करेगा. अगर सरकारी अस्पताल में इलाज करवाएं तो एक अपॉइंटमेंट में क़रीब 100 रुपये लगते हैं. लेकिन प्राइवेट सेटअप में 500 से हज़ार रुपये तक लग सकते हैं.''