Friday, August 16, 2019

MBBS: क्या भारत में ‘बेची’ जा रही हैं सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटें?

राजस्थान के मेडिकल स्टूडेंट्स इस बात से बेहद नाराज़ हैं कि ओबीसी और एससी/एसटी कोटे की कट-ऑफ़ से भी कम नंबर पाने वाले कुछ छात्रों को इस वर्ष राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाख़िला दिया गया है.
इन छात्रों का आरोप है कि "ये दाख़िले NEET के स्कोर को देखकर नहीं, बल्कि फ़ीस भरने की क्षमता के आधार पर हुए हैं. तो क्या सरकार सीटें बेचने लगी है?"
ये छात्र सबूत के तौर पर राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग से जारी MBBS स्टूडेंट्स की एक लिस्ट दिखाते हैं जिसमें ऐसे कई छात्रों के नाम हैं जिनका NEET स्कोर 50-55 परसेंटाइल से भी कम है.
ये वो स्टूडेंट हैं जिन्हें इस साल राज्य सरकार द्वारा लागू एनआरआई कोटे के तहत एडमिशन मिला है.
राजस्थान में एनआरआई कोटे की दो सौ से ज़्यादा सरकारी सीटें निर्धारित की गई हैं जिनके ख़िलाफ़ राज्यस्तर की 'मेडिकल स्टूडेंट्स कॉर्डिनेशन कमेटी' बीते तीन महीने से विरोध प्रदर्शन कर रही है.
राजस्थान के अजमेर, कोटा, उदयपुर, जयपुर और बीकानेर मेडिकल कॉलेज समेत प्रदेश के सभी 14 मेडिकल कॉलेज कैंपस पिछले दिनों सरकार विरोधी नारों से गूँजते दिखे और कुछ छात्र भूख हड़ताल पर भी रहे.
लेकिन राज्य सरकार ने एनआरआई कोटे से जुड़ी मेडिकल छात्रों की माँगों पर कोई विचार नहीं किया, इसलिए ये छात्र अब इस कोटे को 'सरकार के पैसा कमाने की स्कीम' कह रहे हैं.
सरकारी आदेशों के अनुसार राजस्थान सरकार ने जून 2019 में शैक्षणिक सत्र 2014-15 के बाद बढ़ाई गई मेडिकल सीटों में से 15 प्रतिशत सीटें एनआरआई कोटे से भरने का फ़ैसला किया है.
राजस्थान सरकार के इस नये बंदोबस्त के अनुसार राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कुल 212 सीटें एनआरआई कोटे के लिए रिज़र्व की गई हैं.
मेडिकल एजुकेशन विभाग के मुताबिक़ ये कोटा एमबीबीएस और डेंटल कोर्स के अलावा आगे की पढ़ाई, यानी पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स के दाख़िलों पर भी लागू होगा.
सुरेश चंद ने कहा कि राज्य सरकार इस कोटे की मदद से विदेशी छात्रों को अपने यहाँ पढ़ने के लिए आमंत्रित करना चाहती है. साथ ही एक लक्ष्य यह भी है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों के लिए कुछ अधिक पैसा जुटाया जा सके. यही वजह है कि एनआरआई कोटे के तहत आवेदन करने वाले छात्रों से सामान्य छात्रों की तुलना में ज़्यादा फ़ीस ली जा रही है.
एनआरआई कोटे वाली सीट पर सालाना फ़ीस कितनी है? यह पढ़ने से पहले आप ये जान लें कि फ़ीस को लेकर भी राजस्थान के मेडिकल स्टूडेंट पिछले एक साल से सरकार की आलोचना कर रहे हैं.
उनका कहना है कि साल 2017 में हॉस्टल, ट्यूशन, अकादमिक और स्पोर्ट्स फ़ीस को मिलाकर एक छात्र को प्रति वर्ष 6,000 रुपये जमा करने होते थे. साल 2018 में इसे बढ़ाकर क़रीब 50,000 रुपये प्रति वर्ष कर दिया गया.
साथ ही सरकार ने यह नियम भी बना दिया कि मेडिकल स्टूडेंट्स की फ़ीस हर साल दस फ़ीसदी बढ़ाई जाएगी.
अब बात एनआरआई कोटे वाली सीटों की. एडिश्नल डायरेक्टर सुरेश चंद के मुताबिक़ इन सीटों पर दाख़िला लेने वाले छात्रों को हर वर्ष तक़रीबन 14 से 15 लाख रुपये फ़ीस जमा करनी होगी.
लेकिन मेडिकल स्टूडेंट्स कॉर्डिनेशन कमेटी में शामिल सभी सरकारी कॉलेजों के प्रतिनिधि सरकार के इस तर्क से असहमत हैं.
वो सवाल उठाते हैं कि किसी अन्य स्टूडेंट से ज़्यादा पैसे लेकर, राज्य के एक ज़्यादा मैरिट वाले छात्र की सीट उससे छीन लेना कहाँ तक न्यायोचित है?
राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग के एडिश्नल डायरेक्टर सुरेश चंद ने बीबीसी को बताया कि "राजस्थान में 14 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं. इनमें से 6 कॉलेज सीधे तौर पर सरकार के अंतर्गत आते हैं. बाक़ी 8 कॉलेज सरकारी समितियों द्वारा संचालित हैं. राज्य की 212 एनआरआई सीटों को इन सभी 14 सरकारी कॉलेजों के बीच बाँटा गया है. इससे पहले एनआरआई कोटा सिर्फ़ राज्य के प्राइवेट कॉलेजों में ही ऑफ़र किया जाता था."

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